मंगलवार, 28 जून 2011

जैसे थे......कविता .....ड़ा श्याम गुप्त ...

पहले जर जोरू ज़मीन पर -
झगड़े होते थे;
और  खानदानी रंजिश के ,
बीज बोते थे |
पूरे के पूरे घर,कुटुंब, गाँव-
के सफाए होते थे |
खेतों खलिहानों में कभी कभी-
वलात्कार भी होते थे ||

आज हम लंगोटी की जगह,
सूट पहनने लगे हैं,
तीर तलबार की जगह ,
बन्दूक रखने लगे हैं |
झोंपडी की जगह-
अट्टालिकाओं में रहने लगे हैं |
टाटा सफारी क्वालिस व सेंट्रो कार में
चलने लगे हैं |
अतः ह्त्या व वलात्कार -
राह चलते होने लगे हैं ||

हमने  बहुत प्रगति की है ,
यह सही है ;
पर मन से व कर्म से,
लगता है, हम वहीं हैं;
वहीं के वहीं हैं ||


3 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही लिखा है आपने नैतिक मूल्यों का पतन बहुत अधिक हुआ है...समाज गर्त किया और पहले से ज्यादा गया है ....हम सब की जिम्मदारी है बिगड़ते हालातों को काबू में करने की ...व् भारत को आध्यात्मिकता के साथ आधुनिक बबनाना होगा तभी समाज व् देश उनती कर सकता है

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  2. हमने बहुत प्रगति की है ,
    यह सही है ;
    पर मन से व कर्म से,
    लगता है, हम वहीं हैं;
    वहीं के वहीं हैं ||
    bilkul sahi kaha hai aapne ham aadim jamane ki aur hi laut rahe hain .
    sundar bhavabhivyakti badhai.

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  3. सही कथन --तरुण जी....व शालिनी....

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